देहरादून(हरिशंकर सैनी)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में “संघ यात्रा – नये क्षितिज, नये आयाम” विषय पर प्रमुख जन गोष्ठी एवं विविध क्षेत्र समन्वित संवाद का आयोजन देहरादून स्थित Himalayan Cultural Center के सभागार में हुआ। कार्यक्रम में संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।
कार्यक्रम का शुभारंभ सरसंघचालक द्वारा भारत माता के चित्र पर पुष्प अर्पण एवं सामूहिक वंदेमातरम् गायन से हुआ। संचालन विभाग प्रचार प्रमुख गजेन्द्र खंडूड़ी ने किया। प्रांत कार्यवाह दिनेश सेमवाल ने अपने प्रारंभिक संबोधन में संघ के शताब्दी वर्ष के अंतर्गत उत्तराखंड में आयोजित विविध कार्यक्रमों—विजयदशमी पथ संचलन, घोष संचलन, गृह संपर्क अभियान तथा हिंदू सम्मेलनों—की जानकारी देते हुए आगामी योजनाओं का खाका प्रस्तुत किया।

“ऊपर से जो दिखता है, वह सदैव सत्य नहीं”
सरसंघचालक ने कहा कि संघ को केवल बाहरी स्वरूप से समझना संभव नहीं है। पथ संचलन देखकर उसे अर्धसैनिक संगठन मान लेना या राष्ट्रगीतों के आधार पर उसे संगीत मंडली समझ लेना वास्तविकता नहीं है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे चीनी की मिठास को जानने के लिए उसे चखना पड़ता है, वैसे ही संघ को समझने के लिए उसके कार्य में सहभागी होना आवश्यक है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ का किसी संगठन से प्रतिस्पर्धा नहीं है। राष्ट्र सशक्त होगा तो नागरिक भी सशक्त होंगे। यदि राष्ट्र दुर्बल होगा तो व्यक्ति अपने ही देश में सुरक्षित नहीं रह सकेगा। संघ का उद्देश्य व्यक्ति निर्माण है, क्योंकि सशक्त व्यक्ति से ही सशक्त समाज और राष्ट्र का निर्माण संभव है।

डॉ. हेडगेवार के प्रसंग
संघ संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन का उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा कि वे जन्मजात देशभक्त थे। बाल्यकाल में महारानी विक्टोरिया के जन्मदिवस पर वितरित मिठाई लेने से उनका इंकार उनकी राष्ट्रनिष्ठा का प्रमाण था। वे अनुशीलन समिति से जुड़े रहे और वंदेमातरम् गान के कारण अंग्रेजों द्वारा मुकदमे का सामना भी किया। उनका संकल्प था कि भारत दोबारा पराधीन न हो—इसी उद्देश्य से संघ की स्थापना की गई।
“विश्व की आशा भारत से”
भागवत ने कहा कि लंबी ऐतिहासिक यात्रा के बाद आज विश्व भारत को पुनः नेतृत्वकारी भूमिका में देखने की अपेक्षा कर रहा है। उन्होंने उपस्थित जनसमूह से संघ की गतिविधियों से जुड़कर समाज और राष्ट्र को सशक्त बनाने का आह्वान किया। संघ के “पंच परिवर्तन” सिद्धांतों के माध्यम से भारत को परम वैभव तक ले जाने का संकल्प लेने की अपील भी की।
भेदभाव मन से मिटेगा
प्रश्नोत्तर सत्र में सामाजिक भेदभाव के विषय पर उन्होंने कहा कि कुरीतियों का मूल कारण व्यवस्था नहीं, बल्कि मन है। अंधकार को पीटने से नहीं, प्रकाश जलाने से समाप्त किया जा सकता है। व्यवहार में परिवर्तन से ही समाज में समरसता आएगी। उन्होंने कहा कि संघ में अनेक स्वयंसेवक दशकों तक कार्य करते हैं, पर पहचान की अपेक्षा नहीं रखते—क्योंकि कार्य ही प्रधान है।
तकनीक साधन, संस्कार साध्य
डिजिटल युग पर उन्होंने कहा कि तकनीक केवल साधन है, साध्य नहीं। उसका उपयोग संयम और अनुशासन से होना चाहिए। परिवार में आत्मीयता और संवाद बना रहना आवश्यक है। तकनीक के लिए मनुष्य की बलि नहीं दी जा सकती।
महिलाओं की भागीदारी 50 प्रतिशत तक हो
महिलाओं की भूमिका पर उन्होंने कहा कि देश संचालन में उनकी भागीदारी 33 प्रतिशत ही नहीं, 50 प्रतिशत तक होनी चाहिए। प्रतिबंध काल में महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

पर्यावरण, शिक्षा और सामाजिक सद्भाव
उत्तराखंड की नदियों और पर्यावरण संरक्षण पर उन्होंने समन्वित नीति और स्थानीय सहभागिता पर बल दिया। शिक्षा में पाठ्यक्रम से अधिक शिक्षकों के संस्कारों को महत्वपूर्ण बताया। आरक्षण, वर्गीकरण और समान नागरिक संहिता जैसे विषयों पर उन्होंने समाज में प्रमाणिकता और सद्भाव बनाए रखने की आवश्यकता जताई।
राजनीति नहीं, व्यक्ति निर्माण
उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ हिंदुत्व की राजनीति नहीं करता, बल्कि व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज उत्थान का कार्य करता है। भ्रष्टाचार मन से प्रारंभ होता है और वहीं समाप्त किया जा सकता है। जनसंख्या को बोझ और संसाधन—दोनों दृष्टियों से देखने की आवश्यकता बताते हुए समान रूप से लागू होने वाली नीति पर बल दिया।
कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों के प्रबुद्धजन, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद, उद्योगजगत के प्रतिनिधि और बड़ी संख्या में स्वयंसेवक उपस्थित रहे। अंत में राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ।
भेदभाव व्यवस्था से नहीं, मन से पैदा होता है” – मोहन भागवत
▪ संघ का उद्देश्य प्रतिस्पर्धा नहीं, व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण
▪ “ऊपर से जो दिखता है, वही पूर्ण सत्य नहीं” — संघ को समझने के लिए कार्य से जुड़ना आवश्यक
▪ महिलाओं की भागीदारी 50% तक होनी चाहिए
▪ तकनीक साधन है, संस्कार और आत्मीयता ही वास्तविक शक्ति
▪ 2000 वर्षों की यात्रा के बाद विश्व की आशा भारत से
▪ सामाजिक कुरीतियाँ व्यवहार परिवर्तन से ही समाप्त होंगी
▪ जनसंख्या को बोझ नहीं, संसाधन के रूप में भी देखने की जरूरत
▪ शिक्षा में पाठ्यक्रम से अधिक शिक्षकों के संस्कार महत्वपूर्ण
▪ संघ हिंदुत्व की राजनीति नहीं, समाज उत्थान का कार्य करता है


