आज के दौर में जब भोग-विलास, दिखावा और तेज़ रफ्तार जीवनशैली ने युवाओं को मानसिक रूप से अशांत और दिशाहीन कर दिया है, ऐसे समय में समाज को उन मार्गदर्शकों की सबसे अधिक आवश्यकता है जो केवल उपदेश नहीं, बल्कि अपने कर्मों से रास्ता दिखाएं।
देहरादून के गढ़ी कैंट क्षेत्र में नून नदी के तट पर स्थित संतोषी माता गौशाला, एकादश मुखी हनुमान मंदिर और निरंतर चल रही निःस्वार्थ गौ सेवा इसी कर्मयोग की जीवंत मिसाल हैं।
इन सेवाओं के केंद्र में हैं बाबा भवानी गिरी जी महाराज, जिन्होंने सनातन धर्म को केवल पूजा-पाठ तक सीमित न रखकर उसे करुणा, सेवा और संयम से जोड़ा है। सड़कों पर घायल और तड़पती गोमाता से लेकर भटकती युवा पीढ़ी तक, बाबा का प्रयास है कि हर पीड़ा को धर्म के सहारे राहत मिले। बिना किसी सरकारी सहायता के सीमित संसाधनों में गौशाला का संचालन और बीमार व दुर्घटनाग्रस्त गोवंश का उपचार उनकी साधना का ही एक रूप है।
वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर सिंह सैनी ने बाबा भवानी गिरी जी महाराज से विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस विशेष साक्षात्कार के प्रमुख अंश—
प्रश्न: सनातन धर्म की सेवा में आने का मुख्य कारण क्या रहा?
उत्तर:
सनातन धर्म कोई अचानक अपनाने की चीज नहीं है, यह संस्कारों से जीवन में उतरता है। बचपन से ही परिवार में पूजा, सेवा और साधु-संतों का सम्मान रहा। लेकिन जब समाज की पीड़ा को नज़दीक से देखा, तभी जीवन की असली दिशा मिली।
1990 के दशक में मां संतोषी माता मंदिर की स्थापना के बाद मैं पूरी तरह धार्मिक और सेवा कार्यों में जुट गया। सड़कों पर बीमार और दुर्घटनाग्रस्त गायों को देखकर मन भीतर से हिल गया। उसी दिन तय किया कि पूजा के साथ सेवा भी करूंगा। मां संतोषी माता की कृपा से सेवा का मार्ग मिला और हनुमान जी की भक्ति से शक्ति। यही तीनों मेरे जीवन की धुरी हैं।
प्रश्न: भोग-विलास से भरे आज के दौर में धर्म की भूमिका क्या है?
उत्तर:
धर्म जीवन को रोकता नहीं, दिशा देता है। भोग-विलास अगर सीमित हो तो जीवन का हिस्सा है, लेकिन जब वही लक्ष्य बन जाए तो विनाश तय है। धर्म संयम और शांति सिखाता है। जब इंसान समझ लेता है कि पैसा और पद साधन हैं, साध्य नहीं, तभी जीवन संतुलित होता है।
प्रश्न: युवा पीढ़ी सनातन मार्ग से क्यों भटक रही है?
उत्तर:
सबसे बड़ा कारण संस्कारों की कमी और दिखावाद है। सोशल मीडिया पर दिखने वाली चमक को ही सफलता मान लिया गया है। जब आत्मा भूखी रह जाती है, तब नशा और गलत संगत जीवन में प्रवेश कर जाते हैं। मूल से दूरी का मतलब ही भटकाव है।
प्रश्न: युवाओं को सनातन धर्म से जोड़ने के लिए आपके प्रयास?
उत्तर:
हम धर्म थोपते नहीं, उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। गौशाला में आने वाले युवा पहले देखने आते हैं, फिर सेवा करते-करते बदल जाते हैं। सेवा से करुणा जागती है और वहीं से धर्म की शुरुआत होती है।
प्रश्न: गौ सेवा कितनी चुनौतीपूर्ण है?
उत्तर:
गौ सेवा में लाभ नहीं, केवल जिम्मेदारी है। चारा, दवाइयां और इलाज सब महंगे हैं। बिना सरकारी सहायता के काम कर रहे हैं, लेकिन सेवा नहीं रुकती। जब उद्देश्य पवित्र होता है, रास्ता अपने आप निकल आता है।
प्रश्न: मां संतोषी माता की साधना का संदेश?
उत्तर:
मां संतोषी माता संतोष का प्रतीक हैं। आज सबसे बड़ी बीमारी असंतोष है। संतोष आ जाए तो आधी परेशानियां खत्म हो जाती हैं।
प्रश्न: एकादश मुखी हनुमान साधना युवाओं को कैसे प्रभावित करती है?
उत्तर:
हनुमान जी शक्ति और संयम के प्रतीक हैं। नियमित साधना से आत्मबल आता है। मंत्र जादू नहीं, अनुशासन है। अनुशासन से वासनाएं स्वयं पीछे हट जाती हैं।
प्रश्न: मंदिरों की सामाजिक भूमिका क्या है?
उत्तर:
मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, संस्कार केंद्र हैं। सेवा और साधना से युवाओं में स्थायी बदलाव आता है।
प्रश्न: भविष्य की योजनाएं?
उत्तर:
गौशाला का विस्तार, युवाओं के लिए सेवा शिविर, संस्कार शिक्षा और साधना केंद्र स्थापित करना।
प्रश्न: युवाओं के लिए संदेश?
उत्तर:
भोग को छोड़ो मत, उस पर नियंत्रण रखो।
सेवा, साधना और संयम—यही सनातन जीवन है।
निष्कर्ष:
बाबा भवानी गिरी जी महाराज का जीवन यह स्पष्ट करता है कि सनातन धर्म केवल पूजा नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। गौ सेवा, मां संतोषी माता की भक्ति और हनुमान साधना के माध्यम से वे समाज और विशेषकर युवाओं को भोग-विलास से निकालकर सेवा, संयम और शांति के मार्ग पर ले जा रहे हैं।
उत्तराखंड परिकल्पना के लिए विशेष साक्षात्कार
— हरिशंकर सिंह सैनी

