देहरादून(अनिल शीर्षवाल)। दीपावली का पर्व 20 अक्टूबर 2025 को है, अथवा 21 अक्टूबर 2025 को है ,इस विषय पर देश के विद्वानों में सोशल मीडिया पर सीधी बहस के बीच उत्तराखंड ज्योतिष रत्न आचार्य डॉक्टर चंडी प्रसाद घिल्डियाल “दैवज्ञ” का बहु प्रतीक्षित निर्णायक बयान आया है उन्होंने कहा है कि पर्व निर्णय धर्मशास्त्र का विषय है, और काल गणना करना ज्योतिष शास्त्र का विषय है, सूर्य उदय और सूर्यास्त में देशांतर के कारण भारत में ही 1 घंटे से 30 ,40 ,50 मिनट तक का भी अंतर आ जाता है। भारत के विभिन्न नगरों का अक्षांतर एवं देशांतर अलग-अलग होने के कारण पर्व निर्णय में समानता नहीं हो पाती है।
सौर वैज्ञानिक डॉक्टर चंडी प्रसाद “दैवज्ञ” ने स्पष्ट किया है, कि काशी विद्वत परिषद ने स्थानीय काल की गणना करके शास्त्र प्रमाण के आधार पर 20 अक्टूबर को दीपावली मनाने का निर्णय दिया है, अन्य प्रदेशों की विद्वत परिषदों ने भी स्थान, काल गणना के आधार पर किसी ने 20 अक्टूबर तो किसी ने 21 अक्टूबर 2025 को दीपावली मनाने का निर्णय दिया है। *सटीक भविष्यवाणियों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात आचार्य चंडी प्रसाद का कहना है कि उत्तराखंड गढ़वाल मंडल के सभी पंचांग अक्षांश 26 30 से 29 30 के आधार पर ही बनते हैं। रेलवे टाइम से 10 मिनट से अधिकतम 18 मिनट तक का अंतर होता है ,इसलिए यहां सभी पर्व एक ही समय पर मनाए जाने की परंपरा रही है। इस वर्ष 2025 में 20 अक्टूबर एवं 21 अक्टूबर दोनों दिन अमावस्या तिथि है ,अब लोगों के सामने बड़ा सवाल है कि लक्ष्मी पूजन किस दिन करें? धर्मशास्त्र निर्णय सिंधु के अनुसार महालक्ष्मी पूजन एवं दीपोत्सव प्रदोष काल अमावस्या एवं तंत्र-मंत्र साधना निशीथ काल में ही हो सकती है, इसमें विद्वानों का कर्तव्य है कि लोगों का सही मार्गदर्शन करें। *धर्मशास्त्र सम्मत निर्णय*
जनमानस में राजगुरु के नाम से प्रसिद्ध डॉक्टर चंडी प्रसाद घिल्डियाल “दैवज्ञ” महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहते हैं, कि देश भर के लगभग 21 पंचांगों के अनुसार 20 अक्टूबर को चतुर्दशी तिथि अपराह्न 3:45 पर समाप्त हो रही है, उसके बाद अमावस्या प्रदोष काल को व्याप्त करते हुए निशीथ काल को व्याप्त करते हुए अगले दिन अर्थात 21 अक्टूबर को शाम 5:55 तक विद्यमान है ,और सूर्यास्त 5:35 पर हो रहा है, तो निश्चित रूप से दोनों दिन प्रदोष काल में अमावस्या है।,
निर्णयसिन्धु निर्णयानुसार
प्रदोषसमये लक्ष्मीं पूजयित्वा तत:क्रमात्, दीपवृक्षाश्च दातव्या: शक्त्या देवगृहेषु च।।
कार्तिके मास्यमावास्यां तस्यां दीप प्रदीपनम्।
शालायां ब्राह्मण: कुर्यात स गच्छेत् परमं पदम्।
दर्श अमावास्या प्रदोष काल से आधीरात तक रहने वाली श्रेष्ठ होती है। यदि आधी रात तक न हो तो तो प्रदोष व्यापिनी को लेना चाहिए। क्योंकि प्रदोष काल लक्ष्मी पूजन के लिए अधिक बलवान होता है। दोनों दिन संयोग वसात आ जाये तो कृष्णपक्ष में चतुर्दशी विद्धा के बजाय प्रतिपदा संयुक्त अमावस्या श्रेष्ठ होती है, जो इस वर्ष 21 अक्टूबर को ही है।
इस प्रकार “यस्यय:कालस्तत्कालव्यापिनी तिथि।तया कर्माणि कुर्वीत ह्रासवृद्धि न कारणम्।। (बृ० या०)” या तिथिं समनुप्राप्य उदयं याति भास्कर:। सा तिथि: सकला ज्ञेया स्नानदान जपादिषु।।)(देवल स्मृ०)
प्रदोषो$स्तमयादूर्ध्वं घटिकाद्वयमिष्यते। अर्थात सूर्यास्त के पश्चात दो घटि तक तिथि हो तो वह प्रदोष व्यापिनी तिथि कही गयी है। धर्मसिन्धु के अनुसार दोनों दिन प्रदोष में अमावास्या होतो परा लेने का निर्णय किया गया है ( अस्तोत्तरं घटिकाधिकरात्रीव्यापिनी दर्शे सति न सन्देह : )
धर्म शास्त्रों का हवाला देते हुए उत्तराखंड ज्योतिष रत्न आचार्य दैवज्ञ ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अक्षांश और देशांतर में अंतर होने से पूर्वी उत्तर प्रदेश सहित देश के अन्य भागों में दीपावली 20 अक्टूबर को मनाया जाना सही है, पूरे भारतवर्ष में मंत्र और तंत्र सिद्धि के लिए भी निशीथ काल व्यापिनी अमावस्या में 20 अक्टूबर को अर्धरात्रि में साधना की जाएगी । परंतु पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित गढ़वाल और कुमाऊं मिलाकर पूरे उत्तराखंड में 20 अक्टूबर को छोटी दीपावली तथा 21 अक्टूबर को प्रदोष काल में सायंकाल 5:35 से 8:14 तक प्रदोष काल में महालक्ष्मी पूजन तथा दीपोत्सव का त्योहार मनाना शास्त्र सम्मत है।
