हरिद्वार(अनिल शीर्षवाल)।देवभूमि उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार द्वारा हरिद्वार जिले को लेकर लिए गए हालिया फैसले ने सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। पिछले चार वर्षों से कैबिनेट मंत्री का प्रतिनिधित्व न मिलने वाले हरिद्वार को अब चुनाव से ठीक पहले दो-दो कैबिनेट मंत्री दिए जाने पर राजनीतिक मंशा को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हरिद्वार जैसे महत्वपूर्ण जिले को लंबे समय तक कैबिनेट में उचित प्रतिनिधित्व न देना सरकार की प्राथमिकताओं पर प्रश्नचिह्न लगाता रहा। विपक्ष भी लगातार इस मुद्दे को उठाता रहा, जिससे सरकार पर दबाव बनता गया। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले यह निर्णय कहीं न कहीं उस दबाव को कम करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
दिलचस्प बात यह भी है कि पूर्व में कैबिनेट मंत्री रह चुके चेहरे को दोबारा मौका दिया गया है, वहीं एक ऐसे विधायक को भी कैबिनेट में शामिल किया गया है जो पहले कांग्रेस से जुड़े रहे और बाद में भाजपा में आए। इस फैसले को राजनीतिक संतुलन साधने और सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
हालांकि, पार्टी के अंदरूनी हालात कुछ और संकेत दे रहे हैं। भाजपा और संघ से जुड़े एक वरिष्ठ, तीन बार के विधायक को नजरअंदाज किए जाने से उनके समर्थकों में नाराजगी साफ देखी जा रही है। कार्यकर्ताओं का मानना है कि लंबे समय से संगठन और पार्टी के प्रति समर्पित नेताओं की अनदेखी से गलत संदेश जा रहा है।
सूत्रों की मानें तो पार्टी के भीतर भी इस फैसले को लेकर मंथन और दबाव की स्थिति बनी हुई थी। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि सरकार को संगठनात्मक संतुलन, चुनावी समीकरण और आंतरिक दबाव—तीनों को साधते हुए यह फैसला लेना पड़ा।
अब देखना होगा कि यह निर्णय आगामी चुनाव में भाजपा को कितना लाभ पहुंचाता है या फिर आंतरिक असंतोष और विपक्ष के हमलों के बीच यह मुद्दा और ज्यादा तूल पकड़ता है।
