मुजफ्फरनगर(नीति शर्मा)। समाज में जहां एक ओर बेटियों को अक्सर सीमाओं में बांधने की कोशिश की जाती है, वहीं क्रांतिकारी शालू सैनी ने अपने हौसले और सेवा भाव से एक अनूठी मिसाल कायम की है। “मैं नारी हूँ… हार मानना नहीं जानती” के संकल्प के साथ आगे बढ़ते हुए शालू सैनी अब तक 6000 से अधिक लावारिस और बेसहारा शवों को सम्मानजनक अंतिम विदाई दे चुकी हैं।

हाल ही में ददहेडू चौकी से मिली सूचना पर उन्होंने एक नाबालिग बच्ची की वारिस बनकर पूरे विधि-विधान से उसका अंतिम संस्कार किया। उनका यह कदम न केवल मानवता की मिसाल है, बल्कि समाज के लिए एक गहरा संदेश भी देता है।
शालू सैनी का जीवन संघर्षों से भरा रहा है, लेकिन उन्होंने हर मुश्किल का डटकर सामना किया। वे मानती हैं कि नारी कमजोर नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में खुद को मजबूत बनाने की क्षमता रखती है। अपने इसी जज्बे के दम पर उन्होंने दर्द को ताकत में बदला और दूसरों के लिए सहारा बनीं।
आज शालू सैनी उन सभी महिलाओं और युवतियों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं, जो अपने सपनों को साकार करना चाहती हैं। उनका संदेश स्पष्ट है कि मजबूत इरादों के साथ कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं होता।
उनकी यह पहल समाज में संवेदनशीलता और मानवता की नई मिसाल पेश कर रही है, जो हर किसी को प्रेरित कर रही है।


