देहरादून(हरिशंकर सैनी)।आज जब पूरी दुनिया तनाव, अवसाद, मधुमेह, मोटापा, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है, तब भारत की हजारों वर्षों पुरानी योग परंपरा मानवता के लिए संजीवनी बनकर सामने आई है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में जहां मनुष्य सुविधाओं से समृद्ध हुआ है, वहीं वह मानसिक शांति, शारीरिक संतुलन और आंतरिक संतोष से दूर होता चला गया है। ऐसे समय में योग केवल एक व्यायाम पद्धति नहीं, बल्कि संतुलित और स्वस्थ जीवन जीने का संपूर्ण विज्ञान बनकर उभरा है।
21 जून को मनाया जाने वाला विश्व योग दिवस आज वैश्विक चेतना का प्रतीक बन चुका है। करोड़ों लोग योग को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बना रहे हैं और यह स्वीकार कर रहे हैं कि स्वास्थ्य केवल रोगों की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा के बीच सामंजस्य की अवस्था है। यही संदेश भारत ने सदियों पहले दुनिया को दिया था और आज पूरा विश्व उसकी प्रासंगिकता को अनुभव कर रहा है।
महर्षि पतंजलि ने योग को चित्त की वृत्तियों के निरोध का मार्ग बताया था। अर्थात मन की चंचलता, तनाव और विकारों पर नियंत्रण स्थापित कर आत्मिक शांति प्राप्त करना ही योग का मूल उद्देश्य है। दुर्भाग्यवश वर्तमान समय में योग को केवल आसनों तक सीमित समझ लिया गया है, जबकि वास्तविक योग जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनुशासन, संतुलन, संयम और सकारात्मकता का समावेश करता है।
योग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह उपचार से अधिक बचाव पर बल देता है। नियमित योगाभ्यास न केवल शरीर को स्वस्थ रखता है, बल्कि मानसिक दृढ़ता, एकाग्रता, आत्मविश्वास और कार्यक्षमता को भी बढ़ाता है। यही कारण है कि आज विश्व के बड़े-बड़े चिकित्सा संस्थान और शोध संगठन भी योग के लाभों को स्वीकार कर रहे हैं।
विश्व योग दिवस 2026 हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि हम योग को केवल एक दिन का उत्सव न बनाकर अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाएं। क्योंकि स्वस्थ व्यक्ति से स्वस्थ परिवार, स्वस्थ परिवार से स्वस्थ समाज और स्वस्थ समाज से ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव है।
आइए संकल्प लें— योग अपनाएं, निरोग रहें और भारत को विश्व स्वास्थ्य गुरु बनाने में अपना योगदान दें,



